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मंगलवार, 29 मई 2012

कोई भी उम्मीद नज़र नहीं आती

कोई भी उम्मीद नज़र नहीं आती
तहजीब हमको अगर नहीं आती !
यूँ तो आती है बहुत शर्म हमको
खुद अपने आप से पर नहीं आती !
दूर से चली जाती है हमें देखकर 
कोई ख़ुशी हमारे इधर नहीं आती !
उसके वादों में इक उम्र गुजारी है
कहती है कि आयेंगे,पर नहीं आती !
जिन्दगी इतना उधम मचा रही है
मौत भी डरकर इधर नहीं आती !
दिन तो तरह-तरह से काट लेता हूँ
रात मगर कमबख्त काटी नहीं जाती !
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बिटियाओं पर मेरा स्नेह और आशीर्वाद सदा ही बेटों से ज्यादा है,ये दोनों बेटियां कहने को मेरी तो नहीं हैं,श्यामल सुमन जी की पोतियाँ है शायद,मगर मेरे मन की कहूँ तो दुनिया की सारी बिटियाओं के लिए मैं खुद इक क्षत्र छाया बन जाना चाहता हूँ,बेटियों को घर में देखकर एक सुखद आनंदपूर्ण अनुभूति होती है,आँख भर आती है अक्सर,कि उन्हें विदा करना है,जिन्हें रातों जग-जग कर पाला है,और पता नहीं क्या-क्या कुछ किया है जिनके लिए,बस यही मन में होता है,वो अपने भीतर की दौलत को पहचाने,अपने देश की,मिटटी की और विश्व की पहचान बने...अपने परिवार का गौरव बनें...बेटों ने कितना बदला है विश्व को,सो तो मैं देख चूका....अब सारा विश्वास,सारी आशा बेटियों पर ही बच गयी है....मेरी आशा निरर्थक ना जाए..हमारी बेटियां विश्व की सिरमौर बने....और मैं कह सकूँ....कि हाँ ये मेरी बेटियां हैं....कि सारी बेटियाँ मेरी ही बेटियाँ हैं....!!

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एक फरियाद है सबसे.....
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सब अच्छे हो जाओ ना....!!
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आठ आना बढाकर एक आना कम कर दो.....पब्लिक मूरख है....पचा ही लेगी.....!!

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काल चल रहा है हमारे साथ....
अगर उसकी भाषा हम समझ सकें तो.....
काल चल रहा है हमारे साथ.....
अगर उसकी चाल समझ सकें तो......
काल चल रहा है हमारे साथ.....
अगर उसका मिजाज हम परख सकें तो....
काल चल रहा है हमारे साथ.....
अगर उसकी रफ़्तार समझ सकें तो.....
काल चल रहा है हमारे साथ.....
अगर उसका एक अंश भी समझ पाने में समर्थ हों हम
तो बदल सकते हैं हम खुद को
भीतर से पूरा का पूरा....
.....सम्पूर्ण....!!
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गरीब लोगों को भूख बड़ी लगती है...
भूखों को भूख लगना लाजिमी है....
अमीरों को भूख बड़ी लगती है....
गरीबों से कहीं बहुत-बहुत ज्यादा
लगता है उनकी तबियत बहुत ज्यादा खराब है....!!
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कौन नहीं जानता है कि हम ज्यादा खा नहीं सकते...
मगर हम खाते जाते हैं
खाते जाते हैं....खाते जाते हैं....
हमारा घर एक संडास है....
तरह-तरह के फर्नीचरों का
तरह-तरह की अन्य चीज़ों का....
हमारी तिजोरी भी एक संडास ही है
जिसमें रखे हुए हैं हम अपना कचरा
और मजा यह कि हम उसे धन समझते हैं...
जिसे हम खा नहीं सकते....
पहन नहीं सकते
और ओढ़ भी नहीं सकते
उस धन को पता नहीं किससे-किससे छीन लाते हैं हम
तरह-तरह के तर्क से अपने धन को जायज ठहराते
और अपने कुकर्मों को छिपाते
हमने दरअसल खुद को संडास बना डाला है
और मजा यह कि
इसकी भी हमें खबर ही नहीं....!!
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कितना लाइक करते हैं हम
अच्छी-अच्छी बातों को
और शेयर भी करते हैं उन्हें....
हमें पता है कि
अच्छी चीज़ें ही हमारे लिए बेहतर हैं....
फिर भी हम खुद को
अच्छा बनाने की कोशिश नहीं करते....!!
क्यों दोस्तों....??!!

1 टिप्पणी:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
पोस्ट साझा करने के लिए आभार!