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रविवार, 13 मई 2012

क्या अब भी कहूँ मैं हैप्पी मदर्स डे !!


हर पल इक नया दर्द है,जिन्दगी
आ मुझे बांह में भर ले जिन्दगी !
मुश्किलें सख्त हैं तेरे हर रस्ते में
मुश्किलों का हल भी है जिन्दगी !
अच्छे रस्तों में कोई साथ देता नहीं
फिर भी अच्छी लगती है जिन्दगी !
तेरे संग मिलकर चलना चाहता हूँ
आ मेरे संग ही तू चल जिन्दगी !
हर किसी को ख़ुशी दें सकें अगर
काम आ जाए सच में ही जिन्दगी !
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हम किसी को आखिर क्या देते हैं
खुद का चरित्र बयान कर देते हैं !
धरती है,प्राणी हैं और इंसान भी
सबको अपनी बपौती समझ लेते हैं !
खोद-खोद कर धरती का हर कोना
इस माता को कंगली किये देते हैं !
सिर्फ अपने बारे में सोचा करते हैं
और बातें अच्छी,बड़ी-बड़ी करते हैं !
सबसे मिलकर रहना अभी सिखा नहीं
फिर भी हम खुद को समाज कहते हैं !
सोचता हूँ कि कह दूं मुहं पे खरी-खरी
कुछ सोच कर मगर मूंह सी लेते हैं !!
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किसी लड़की को गन्दी नज़र से देखना
और फिर कहना हैप्पी मदर्स डे
है तो बड़ा अपमानजनक मगर
मैं क्या जानूं कि किसी के मन में क्या है ?
अभी भी कोई बिटिया मारी जा रही है गर्भ में
और बातें भी की जा रही हैं टी.वी.पर बड़ी-बड़ी
सचमुच क्या बदल रहा है इस सबसे ?
क्या सचमुच कुछ बदल ही जाना है इसके बाद ?
मैं देख रहा हूँ बहुर सारी बच्चियों की
आँखों से निकलती हुई चिंगारियां
जो किसी ना किसी अपने-सगे की
हवस का शिकार हुई हैं कभी-ना-कभी !
कैसा लगता होगा उन्हें जब कोई वहशी इंसान
उनके सामने ही कहे हैप्पी मदर्स डे !
जो बनाने को आतुर है उन्हें बिन ब्याही हुई माँ !
अपनी चारों तरफ देख रहा हूँ दरिंदों का विशाल साम्राज्य
और स्टेज पर महिलाओं का स्वागत-गान करते हुए
सब कुछ वैसा-का-वैसा ही चलता जा रहा है
मौक़ा मिलते ही पुरुष स्त्री का शिकार करता जा रहा है
फिर भी युग बदलने की अवधारणा मीडिया पर चा रही है
और इसी मीडिया मी किसी की माँ की-बहन की,की जा रही है !!
अभी-अभी बिटिया ने पूछा मुझसे एक प्रश्न
क्या आप करते हो अपनी माँ से बहुत-बहुत प्यार
मैंने कहा हाँ,तो उसने कहा तो फिर क्यों नहीं कहाँ आपने
अपनी मम्मी को हैप्पी मदर्स डे ??
मैं निरुत्तर हूँ तब से मगर यह विचार आ रहें हैं
कि हम सब भला कहाँ जा रहे हैं ?
दोस्तों,सच में माँ में जो असीम ममता है,सच्चाई है
और धरा पर यह नेमत भला किसने नहीं पायी है !
दुनिया की ओ तमाम स्त्रियों
तुम्हें इस नाचीज़ का अपने पूरे भरे-भीगे अंतर्मन से
हैप्पी-हैप्पी-हैप्पी मदर्स डे तो ऑल ऑफ यूं....!! 
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दर्द तो बिखरा हुआ है मेरे सीने में
सलवटें पड़ी हुईं हैं क्यूँ फिर माँ के माथे पर !!

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बातें-बातें-बातें कित्ती प्यारी बातें
हम सब जिन्हें करते नहीं अघाते
दुनिया को अपने ठेंगे पर रखते
अच्छी दुनिया की बातें बनाते
तरह-तरह के मंचों पर सबको अपना बताते
इक ज़रा से गुस्से पर सबको हम लतियाते
बातें-बातें-बातें कित्ती प्यारी बातें
हम सब जिन्हें करते नहीं अघाते
जिन चीज़ों से दुनिया अच्छी होती
उनसे सदा मुहं ही बिसराते
सच के मुहं पर लगा कर ताला
हर क्षण झूठ बतियाते
बातें-बातें-बातें कित्ती प्यारी बातें
हम सब जिन्हें करते नहीं अघाते
घमंड को अपनी शान समझते
और गरीबों से पीछा छुडाते
जिस सीढ़ी पर चढ़कर आये
उसे ही काट गिराते
निर्ममता को अपनी कूंजी बनाकर
हवस से धन कमाते
और किसी की हाय की फिक्र नहीं हमें
उस धन को निर्लज्जता से उड़ाते
 
बातें-बातें-बातें कित्ती प्यारी बातें
हम सब जिन्हें करते नहीं अघाते !!

2 टिप्‍पणियां:

sushma 'आहुति' ने कहा…

माँ के प्यार में निस्वार्थ भाव को समेटती आपकी खुबसूरत अभिवयक्ति..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

अच्छी पोस्ट!
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मातृदिवस की शुभकामनाएँ!