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मंगलवार, 8 मई 2012

पागल हूँ....दीवाना हूँ.....या कि क्या हूँ मैं....!!??

सुबह होने दो,सुबह को हम ये पूछेंगे 
रात भर तेरे साथ क्या क्या हुआ 
तुझको बिछडा हुआ सूरज मिला कि नहीं....
रात होते ही तू बौरा-सा क्यूँ जाता है...
दिन निकलते ही सब कुछ वही सा हो जाता है 
फिर भी जाने क्यूँ ऐसा-सा लगता है....
रात ने अपनी कोख से इक नया दिन है जना....!!
रोज इक नयी सी रात हुआ करती है....
ठीक उसी तरह,जिस तरह 
इक नया दिन निकलता है....!!
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तू तो जाकर के कहीं 
और भी मुझमें गया है समा 
तेरे लफ़्ज़ों को पीता हूँ....जीता हूँ....
तेरी आवाज़ रूह बनकर मेरी 
मेरे भीतर ही कहीं हो गयी है फना....!!
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जिसको गाता रहा हूँ मैं उम्र भर....
जिसने मुझको बड़ा किया है इतना 
मैं किसी को ये बता भी नहीं सकता 
मेरे जीतू ने मुझे दिया है कितना-कितना....!!
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एक गुजरा हुआ कल,जो कभी ना लौटेगा...
अपने लफ़्ज़ों से तर हमें करता रहेगा....
लफ्ज़ के मानी यही तो होते हैं...
चेहरे रहते नहीं मगर लफ्ज़ रह जाते हैं 
और ये ही लफ्ज़ अक्सर हमारे जेहन में 
चेहरा बन-बन कर आते हैं....हमें रुलाते हैं....!
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ख़्वाबों की फसल काटने को जा रहें हैं 
अ चाँद-तारों ज़रा ठहरो,हम आ रहे हैं....!!
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उसका चेहरा अगर हंसा-हंसा सा लगे 
तो यह भी तय है कि मौसम भी खिला-खिला सा लगे....!!
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मेरी बातों से मुझे सख्त एतराज़ होने लगा है 
ऐसा लगता है कि ये बातें कही ही नहीं मैनें !
खुद का लिखा हुआ या कहा हुआ होना होना 
खुद के होने की सबसे बड़ी निशानी है 
आदमी फिर क्यूँ ये दोगला हुआ जाता है 
उसके होने में अगर उसका होना सच नहीं है तो फिर 
उसको आखिर किसकी खाल का मान लिया जाए !!
और फिर खुद की बातों को झुठला देवे अगर कोई 
या तो पैदा ही हुआ नहीं वो या मर गया है वो....
किसी ने कुछ कहा है तो इसका मतलब जन्मा है वो कभी 
मगर खुद के चेहरे से मुकर रहा है गर अपनी बातों के बाईस 
तो फिर यह तय कि मरनेवाला है वो....या मर गया है वो अभी....!!!
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सोच-समझ कर चल कि ये पल बदल रहा है 
ना जाने किस तरफ से कैसी हवा चली आये !
जिंदगी को तेज रफ़्तार में बदल दिया है मैंने 
ना जाने कौन सा पल मेरी मौत की खबर लाये !!
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जब भी खुद भीतर मैं नहीं होता.....
कोई आ जाया करता है मेरे भीतर 
सांस रुककर एक टक देखने लगती है उसे
जैसे देखा ही नहीं कभी उसने मुझे...
जब नहीं होता मैं खुद के भीतर कभी 
कोई खो जाता है आकर अंदर मेरे 
दूर तक जाकर जब मैं वापस लौटता हूँ 
किसी और को पाकर अपने भीतर बेचैन हो जाता हूँ 
मेरी साँसे तक उसी के लिए मचलती हैं...!
डरने लगता हूँ कि बिखर कर मर ना जाऊं कहीं 
कोई रूह बनकर समाया हुआ-सा मुझमें रहता है
मेरे तन को मुझसे अलग नहीं होने देता कभी
और इसी तन को खुद का चेहरा समझ लिया है मैंने
कोई आकर कहता है मुझसे,कि ये तू नहीं है
खुद को ढूँढता हुआ जाने कहाँ आ पहुंचा हूँ
मेरा खुद भी मुझसे लापता हो चुका है अब
खुद को ढूँढता हुआ मौत के करीब जा रहा हूँ मैं
फिर कहता हूँ कि अ जिंदगी आ रहा हूँ मैं....!!

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आ कि मिलकर कुछ ख़्वाबों को बना लें हम
फिर उसके बाद जिंदगी में ये रंग रहें ना रहें.....!!

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किसी ने पसंद किया है मुझे इतना कि
मैं खुद को अच्छा लगने लगा हूँ
आज मालूम हुआ है ये कि
मुझमें मैं ही बसा हूँ.....!!!

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आज की रात अगर नींद ना आई तो क्या करूँगा मैं
रात भर तुझसे से नींद के बारे में बातें करूँगा मैं...!!

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भीतर तक तन्हां हूँ मैं
ए कजा आ
मेरे भीतर तक समा जा
शर्त ये है कि मुझमें आकर
तू किसी और में ना जा....!!

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गम को बहुत ज्यादा छिपाएँ तो
और ज्यादा दिखाई देता है...
और अगर उससे मजा पायें तो
वो आधा दिखाई देता है....!!

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ये कौन हंस रहा है मुझपर
मुझे अच्छा लग रहा है...
किसी ना किसी बहाने सही
वो खिलखिला तो रहा है !!

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सँभलने की कोशिश में अक्सर
हम बिखर जाया करते हैं...
इक छोटे से दिल में इत्ते खाब
क्यूँ आया-जाया करते हैं !!

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जो हो रहा है,जो भी हुआ है....
ठाकुर जी की मर्जी....
वैसे भी हमने लगाई नहीं
उसे कोई भी अर्जी....!!

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मिजाज थोड़ा वैसा-सा है
क्या करूँ मैं....
खुदा को बचा नहीं सकता
तो खुद मरुँ मैं....
तेरी इनायतें मुझपे करम हैं
मरने के बाद भी तुझे
ना भूला सकूँ मैं...!!

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दर्द बढ़ता ही जा रहा है
मुस्कुरा रहा हूँ मैं....

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तेरे रू-ब-रू जो हुआ हूँ,मैं खुद को को भूल गया....
मैं ये भी जानता नहीं कि मैं क्या-क्या भूल गया !!

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सांस के अगले सिरे पर मौत खड़ी है
जिंदगी फिर भी मुस्कुराती ही रही है !
सूरज तक रूठा हुआ है मुझसे आज
आज आसमां में कोई लड़ाई छिड़ी है !!

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बुझती हुई आग हूँ तो फिर क्यूँ जल रहा हूँ
दुनिया के तमाम मसलों पे क्यूँ उबल रहा हूँ !!
सर के ऊपर आसमां पे क्यूँ सूरज तप रहा है
नीचे जमीं पर तनहा मैं यूँ ही पिघल रहा हूँ !!

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2 टिप्‍पणियां:

शिखा कौशिक ने कहा…

SARTHAK ABHIVYAKTI .AABHAR

sushma 'आहुति' ने कहा…

वाह! बहुत खुबसूरत एहसास पिरोये है अपने......