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गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

इक गज़ल....और कुछ कुछ....


तू रहे अच्छा,इसलिए खुद को मिटा रहा हूँ मैं
इतना सबकुछ करके भी तेरा रहा कहाँ हूँ मैं !
तेरे आने की राह बुहारने को मैं आया था यहाँ
तुझे नहीं पसंद तो ये ले,यां से जा रहा हूँ मैं !
अपनी हस्ती को संवारने को क्या-क्या किया
इसकी खातिर ना जाने कहाँ से कहाँ रहा हूँ मैं !
कभी फुर्सत के पलों को भी ठीक से ना जीया
कभी इस काम में कभी उसमें मरता रहा हूँ मैं !
तेरे आने के इंतज़ार में ही मैं इत्ता जीता रहा
ऐ मौत ज़रा ठहर जा कि अभी नहा रहा हूँ मैं !
तेरे आने से मन इक चिड़िया सा चहक उठा है
तेरे भीतर से ही कहीं उड़कर बाहर आ रहा हूँ मैं !
उसके घर की हर एक बातें मुझको मालूम हैं अब
खुदा के घर से ही होकर गाफिल आ रहा हूँ मैं !!
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तेरी पलकों पे भी एक 
आंसू सिमट आया है 
धत्त गलती हो गयी....
आंसू नहीं ,मोती था....!!
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गैर को उसने दिया बोसा 
की मेरे दिल ने आह क्यूँ ??
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उमड़ा तो बहुत था तुझे देख-देख कर 
मगर कभी बरस नहीं पाया था मैं !
तुझे दूर-दूर से देखकर ही 
मेरे खुद के पास आया था मैं 
तुने मुझमें ऐसा क्या जगा दिया था 
कि सोते में भी देखा किया तुझको ही 
एक ना पूरा होने वाला ख्वाब 
सूनी आँखों में बस गया था मेरे 
और फिर भी रौनक थी तेरे कहीं होने की 
आज जब तू मेरे पास नहीं है तो भी आकर देख ना 
तेरी यादों से हरदम हरा-भरा हूँ मैं
मेरे आस पास ही कहीं बसा करता है तू....
अब तो हरदम तू मेरे ही पास है कहीं
तेरी रंगीनियों से भरपूर है मेरी जिंदगी,,,,
मैनें खुद को कभी पाया ही नहीं तुझसे दूर कहीं
मैं जानता हूँ मैं हूँ जहां,तू है जरूर वहीँ कहीं
इस हवा में तू है,तू है सब चीज़ों में है अब फना
तुझे किस तरह बताऊँ अ जाना
कि तुझे किस तरह चाहता हूँ मैं....
कि तुझे इस तरह चाहता हूँ मैं
तुझे इसी तरह चाहता हूँ मैं.....!!

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बहुत बार सोचा है यार तेरी सूरत मिटा देने को
मगर क्या करूँ खुद को मिटाने से डरता हूँ मैं !
रोज शाम तक बिखर-बिखर जाया करता हूँ मैं
रोज सुबह तेरी यादों के साथ फिर से संवरता हूँ मैं !!

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सिर्फ आँख से ही ओझल होता है सब कुछ.....
और अगले ही क्षण बैठ जाता है दिल में
वो सब कुछ सदा-सदा के लिए.....!!

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अभी कुछ मत कह मुझे,अभी कुछ सोच रहा हूँ मैं
तू दिखाई मत दे कि तेरे बारे में ही सोच रहा हूँ मैं !
बहुत कुछ पा-पाकर खुद को ही खो दिया है इसने
और क्या पाना बाकी है आदम को,सोच रहा हूँ मैं !
आसमान की बुलंदी पर जा बैठा है आदम,कहते हैं
जमीर की बुलंदी कहाँ है बची इसमें खोज रहा हूँ मैं !
तेरी खूबसूरती पर वारी-न्यारी हुई जाती हैं अँखियाँ
तू गर होता भीतर भी सुन्दर, यही सोच रहा हूँ मैं !
आज तो तेरे बारे में सोच-सोच कर जीया करता हूँ
तेरे ना रहने पर क्या सोचूंगा उफ़,ये सोच रहा हूँ मैं !

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बहुत कुछ दबा पड़ा है मेरे सीने के भीतर
मरने के बाद भी इसे उघाडना मत दोस्तों !
बहुत कुछ झेला है जिंदगी ने,बताना क्या
रिश्ते किसी से मगर बिगाडना ना दोस्तों !
हम सबकी जिंदगी एक फिल्म है दोस्तों
बहुत कुछ बैन है,जिसे उघाडना ना दोस्तों !
बहुत कुछ कहना चाहता हूँ तुमसे मगर
किस बात से करूँ शुरू बतलाना तो दोस्तों !
कोई गज़ल लिखने का मतलब नहीं है मेरा
जो कुछ समझ पाओ,मुझे समझाना दोस्तों !
कुछ हलकी-फुलकी बात लिख दिल हुआ हल्का
अगर तुम्हें ना लगे ठीक तो बतलाना दोस्तों !

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1 टिप्पणी:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!