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बुधवार, 5 जनवरी 2011

ये कौन अज्ञात है........!!



मन मचलता है....
मगर कुछ कह नहीं पाता....
पता नहीं किस दिशा से 
इसे कोई अज्ञात बुलाता....
कौन कानों में कुछ सुरसुरा देता है...
कौन देह को छुईमुई बना देता....
कौन आँखों को रौशन-सा 
करके भी इक धुंध भर देता है 
कौन ह्रदय को महका जाता....
मन मचलता है....
मगर कुछ कह नहीं पाता 
कहाँ से आ जाते हैं  
आँखों में अनंत सपने.....  
कौन कल्पनाओं को बना कर  
मुझमें उड़ेल देता....
कौन नस-नस में जीने की 
ताकत भर देता है....
और भरी उदासी में यकायक 
उमंग को पग देता है.....
ये कौन है जो होकर नहीं है और 
नहीं होकर होने की तरह 
ये कौन है जो हममें  रहकर  भी
अज्ञात की तरह जीता  है....
ये कौन अज्ञात है जो 
हरदम मुझे बुलाता रहता है
मेरे भीतर एक झरने की भांति
अनवरत छलछलाता रहता है.....!!!    

http://baatpuraanihai.blogspot.com/

4 टिप्‍पणियां:

इंदु पुरी गोस्वामी ने कहा…

सच्ची खून मुझे रोने वाली,निराशा,हताशा भरी रचनाएँ बिलकुल अच्छी नही लगती.
'कौन नस-नस में जीने की
ताकत भर देता है....
और भरी उदासी में यकायक
उमंग को पग देता है.....'मन को उत्साहित करने वाली रंग भरने वाली पंक्तियाँ है.बाबु!'ये' वो ही तो है जिसे लोग मंदिर मस्जित,गुरुद्वारों में,धर्म ग्रंथों में ढूँढता फिरता है.'ये' वो ही तो है जो 'राजीव' को एक प्यारा इंसान और कवि बनाए हुए है.उसे इतने शिद्दत से महसूस करते हो! मेरे जैसे हो.एकदम मेरे मन की बात लिखी है और जो सत्य हमारा अपना ना रह कर सबका हो जाये वही तो शाश्वत सत्य है.ईश्वर की तरह.बहुत खूबसूरत मन के इंसान हो.....ये कविता बोल रही है.प्यार.

shikha kaushik ने कहा…

ye kaun agyat hai jo
hardam mujhe bulata rahta hai.
sochne ko vivash karti man ko jhakjhorti kavita.bahut achchhi lagi..mere blog vicharon ka chabootra par bhi aapka hardik abhinandan hai ..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" ने कहा…

ये कौन अज्ञात है जो
हरदम मुझे बुलाता रहता है
मेरे भीतर एक झरने की भांति
अनवरत छलछलाता रहता है.....!!!
--
सुन्दर विश्लेषण!
अच्छी रचना है!

PK SHARMA ने कहा…

bahut achha likha