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मंगलवार, 8 मई 2012

पागल हूँ....दीवाना हूँ.....या कि क्या हूँ मैं....!!??

सुबह होने दो,सुबह को हम ये पूछेंगे 
रात भर तेरे साथ क्या क्या हुआ 
तुझको बिछडा हुआ सूरज मिला कि नहीं....
रात होते ही तू बौरा-सा क्यूँ जाता है...
दिन निकलते ही सब कुछ वही सा हो जाता है 
फिर भी जाने क्यूँ ऐसा-सा लगता है....
रात ने अपनी कोख से इक नया दिन है जना....!!
रोज इक नयी सी रात हुआ करती है....
ठीक उसी तरह,जिस तरह 
इक नया दिन निकलता है....!!
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तू तो जाकर के कहीं 
और भी मुझमें गया है समा 
तेरे लफ़्ज़ों को पीता हूँ....जीता हूँ....
तेरी आवाज़ रूह बनकर मेरी 
मेरे भीतर ही कहीं हो गयी है फना....!!
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जिसको गाता रहा हूँ मैं उम्र भर....
जिसने मुझको बड़ा किया है इतना 
मैं किसी को ये बता भी नहीं सकता 
मेरे जीतू ने मुझे दिया है कितना-कितना....!!
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एक गुजरा हुआ कल,जो कभी ना लौटेगा...
अपने लफ़्ज़ों से तर हमें करता रहेगा....
लफ्ज़ के मानी यही तो होते हैं...
चेहरे रहते नहीं मगर लफ्ज़ रह जाते हैं 
और ये ही लफ्ज़ अक्सर हमारे जेहन में 
चेहरा बन-बन कर आते हैं....हमें रुलाते हैं....!
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ख़्वाबों की फसल काटने को जा रहें हैं 
अ चाँद-तारों ज़रा ठहरो,हम आ रहे हैं....!!
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उसका चेहरा अगर हंसा-हंसा सा लगे 
तो यह भी तय है कि मौसम भी खिला-खिला सा लगे....!!
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मेरी बातों से मुझे सख्त एतराज़ होने लगा है 
ऐसा लगता है कि ये बातें कही ही नहीं मैनें !
खुद का लिखा हुआ या कहा हुआ होना होना 
खुद के होने की सबसे बड़ी निशानी है 
आदमी फिर क्यूँ ये दोगला हुआ जाता है 
उसके होने में अगर उसका होना सच नहीं है तो फिर 
उसको आखिर किसकी खाल का मान लिया जाए !!
और फिर खुद की बातों को झुठला देवे अगर कोई 
या तो पैदा ही हुआ नहीं वो या मर गया है वो....
किसी ने कुछ कहा है तो इसका मतलब जन्मा है वो कभी 
मगर खुद के चेहरे से मुकर रहा है गर अपनी बातों के बाईस 
तो फिर यह तय कि मरनेवाला है वो....या मर गया है वो अभी....!!!
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सोच-समझ कर चल कि ये पल बदल रहा है 
ना जाने किस तरफ से कैसी हवा चली आये !
जिंदगी को तेज रफ़्तार में बदल दिया है मैंने 
ना जाने कौन सा पल मेरी मौत की खबर लाये !!
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जब भी खुद भीतर मैं नहीं होता.....
कोई आ जाया करता है मेरे भीतर 
सांस रुककर एक टक देखने लगती है उसे
जैसे देखा ही नहीं कभी उसने मुझे...
जब नहीं होता मैं खुद के भीतर कभी 
कोई खो जाता है आकर अंदर मेरे 
दूर तक जाकर जब मैं वापस लौटता हूँ 
किसी और को पाकर अपने भीतर बेचैन हो जाता हूँ 
मेरी साँसे तक उसी के लिए मचलती हैं...!
डरने लगता हूँ कि बिखर कर मर ना जाऊं कहीं 
कोई रूह बनकर समाया हुआ-सा मुझमें रहता है
मेरे तन को मुझसे अलग नहीं होने देता कभी
और इसी तन को खुद का चेहरा समझ लिया है मैंने
कोई आकर कहता है मुझसे,कि ये तू नहीं है
खुद को ढूँढता हुआ जाने कहाँ आ पहुंचा हूँ
मेरा खुद भी मुझसे लापता हो चुका है अब
खुद को ढूँढता हुआ मौत के करीब जा रहा हूँ मैं
फिर कहता हूँ कि अ जिंदगी आ रहा हूँ मैं....!!

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आ कि मिलकर कुछ ख़्वाबों को बना लें हम
फिर उसके बाद जिंदगी में ये रंग रहें ना रहें.....!!

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किसी ने पसंद किया है मुझे इतना कि
मैं खुद को अच्छा लगने लगा हूँ
आज मालूम हुआ है ये कि
मुझमें मैं ही बसा हूँ.....!!!

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आज की रात अगर नींद ना आई तो क्या करूँगा मैं
रात भर तुझसे से नींद के बारे में बातें करूँगा मैं...!!

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भीतर तक तन्हां हूँ मैं
ए कजा आ
मेरे भीतर तक समा जा
शर्त ये है कि मुझमें आकर
तू किसी और में ना जा....!!

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गम को बहुत ज्यादा छिपाएँ तो
और ज्यादा दिखाई देता है...
और अगर उससे मजा पायें तो
वो आधा दिखाई देता है....!!

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ये कौन हंस रहा है मुझपर
मुझे अच्छा लग रहा है...
किसी ना किसी बहाने सही
वो खिलखिला तो रहा है !!

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सँभलने की कोशिश में अक्सर
हम बिखर जाया करते हैं...
इक छोटे से दिल में इत्ते खाब
क्यूँ आया-जाया करते हैं !!

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जो हो रहा है,जो भी हुआ है....
ठाकुर जी की मर्जी....
वैसे भी हमने लगाई नहीं
उसे कोई भी अर्जी....!!

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मिजाज थोड़ा वैसा-सा है
क्या करूँ मैं....
खुदा को बचा नहीं सकता
तो खुद मरुँ मैं....
तेरी इनायतें मुझपे करम हैं
मरने के बाद भी तुझे
ना भूला सकूँ मैं...!!

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दर्द बढ़ता ही जा रहा है
मुस्कुरा रहा हूँ मैं....

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तेरे रू-ब-रू जो हुआ हूँ,मैं खुद को को भूल गया....
मैं ये भी जानता नहीं कि मैं क्या-क्या भूल गया !!

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सांस के अगले सिरे पर मौत खड़ी है
जिंदगी फिर भी मुस्कुराती ही रही है !
सूरज तक रूठा हुआ है मुझसे आज
आज आसमां में कोई लड़ाई छिड़ी है !!

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बुझती हुई आग हूँ तो फिर क्यूँ जल रहा हूँ
दुनिया के तमाम मसलों पे क्यूँ उबल रहा हूँ !!
सर के ऊपर आसमां पे क्यूँ सूरज तप रहा है
नीचे जमीं पर तनहा मैं यूँ ही पिघल रहा हूँ !!

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गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

आज भी जो कुछ लिखा......

भीतर-ही-भीतर कोई पिघलता जा रहा है 
मेरे भीतर से जैसे कोई बाहर आ रहा है !!
किसी के समझ नहीं आने को है यह बात 
मुझे भी कोई बहुत देर से ये समझा रहा है !!
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दर्द को बहुत भीतर तक छिपाता हूँ मैं 
उफ़,मगर दर्द बाहर आ ही जाता है!!
कोई धोखा दे डालता जब किसी को 
कलेजा कट कर बाहर आ ही जाता है !!
आदमी अगर सचमच आदमी सा रहे 
चिलमन को खुद ही मजा आ जाता है !!
आदमी किसी को सजा क्यूँ देना चाहता है 
आदमी तो खुद ही बहुत सज़ा पा जाता है !!
मैंने बहुत हुस्न देखा है मगर सच कहूँ ?
सिर्फ अच्छापना ही आदमी को भाता है !!
कोई तूझे भीतर तक देख ना ले "गाफिल"
तू हर वक्त अपना आपा क्यूँ खो जाता है ?
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भीतर-ही-भीतर कोई पिघलता जा रहा है 
मेरे भीतर से जैसे कोई बाहर आ रहा है !!
किसी के समझ नहीं आने को है यह बात 
मुझे भी कोई बहुत देर से ये समझा रहा है !!
जल जाने के बाद क्या मिलता है परवानों को 
तेरे जाने के बाद यह मुझे समझ आ रहा है !!
अभी तो वह खुद नफ़रत की फसल बो रहा है 
उसके बच्चे भुगतेंगे,उसे समझ नहीं आ रहा है !!
मैनें अक्सर उसे मेरे भीतर ही आते हुए देखा है
मगर आज वो जाने क्यूँ मुझसे बाहर जा रहा है !!
कुछ समझाना चाह रहा हूँ लोगों को मैं बरसों से
किन लफ़्ज़ों में समझाऊं,समझ नहीं आ रहा है !!
मैं मेरे बाहर ग़मों से भरा जा रहा हूँ "गाफिल"
और वो मेरे भीतर बैठा मुझपे मुस्कुरा रहा है !!

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शब भर जागेगा चाँद और
तारे भी शब भर जागेंगे
रात भी जागेगी सारी रात
इतने लोगों के बीच भला....
मैं कहाँ तन्हा हो पाउँगा...!!

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मुझे पता था कि तू मुझे पसंद नहीं करता
इसीलिए नज़र फिराता रहता मुझसे तू
मगर आज जब यहाँ नहीं हूँ तो ये क्या
तेरे लब कपकपाने लगे आँख में आंसू आ गए...!!

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छोड़ ना,अब मत ना गिला कर तू किसी बात का 
तेरी खुशियों के लिए तुझे छोड़ कर जा रहा हूँ मैं !!
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आग लगी हुई है भीतर मेरे ऐसी 
कहीं मैं ख़ाक तो नहीं हो जाउंगा 
जिदगी में ही जब कुछ नहीं पाया 
मरकर भी भला क्या पा जाउंगा...!!

रविवार, 22 अप्रैल 2012

आज जो कुछ कह गया.....

हर सू जो दिखाई देता है,वो कौन है 
इस बात पर मेरे भीतर भी मौन है !!

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कोई किसी को क्यूँ पसंद करता है
मैं ये नहीं जानता 
जिंदगी तूने मुझे पसंद किया तो....
मुझमें जरूर कोई बात रही होगी....!!!!

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मुझे पता है कि एक दिन 
तू मुझे अपनी सेज में लिटा कर 
अपनी बाँहों में भरकर प्यार करेगी 
बस इसी प्यार की खातिर 
यह इत्ती बड़ी जिंदगी जिए जा रहा हूँ 
अ मौत,तू थोड़े दिन और ठहर 
मैं थोड़े दिनों में ही आ रहा हूँ....!!!!

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उम्र की सलीब पर कुछ साँसे टंगी हुईं हैं...
वो अगर चुक जाएँ,तो चलूँ 
मौत अगर हाथ आ गयी 
दौलत हाथ लग जायेगी 
जिंदगी को पकडूं तो हाथ मलूँ

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एक और आदमी है मुझमें 
जो हरदम पगलाया हुआ है 
मैं आपको शांत लग सकता हूँ 
वो तावक्त बौराया हुआ है 
मैं उससे सच में मिलना नहीं चाहता 
मगर रहता है वो मुझमें ही कहीं 
मुझे बाहर निकलते वक्त...
मुझमें वापस घुसते वक्त 
पल-पल सामना होता है मेरे-उसका 
मैं क्या करूँ उस पागल का 
आप ही बताऊँ ना दोस्तों....
मैं क्या करूँ उस पागल का....!!

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रात भर खोजता रहता हूँ.....सुबह को....
रात भर मुझे नींद नहीं आती...
सुबह सोने से ठीक पहले 
कुछ खाब आते है रात के 
और मैं जान जाता हूँ...
कि रात भर खूब सोया था मैं 
खाब ना आये तो पता भी न चले 
कि कब रात गयी....
कब सुबह हुई....
ये ही कुछ खाब हैं 
जो मुझे जगाये हुए हैं....
जो मुझे जिलाए हुए हैं....!!!

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चाँद बनकर कुछ सोचा था मैंने....
चांदनी हिस्से में आ गयी....
इससे पहले कि उसे बाहों में भर लेता मैं....
रात मेरे आड़े आ गयी.....
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किसी को कोई बताए ना.......
इसी चाँद को चूमता रहा हूँ मैं सौ-सौ बार....
हज़ार-हज़ार बार.....
आज पता चला यह कि 
यह रौशनी किसी शाम की देह की चिंगारियां थी
....जभी मैं सोचूं.....
चाँद में ये भीगी-भीगी से तपिश सी कैसी है.....!!
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कल चली जाना 
आज भर ठहर जा ना....
जिंदगी 
मुझे पहले मौत को 
अपनी बाहों में भर कर 
चूम लेने दे 
पुरजोश प्यार कर लेने ना 
तू भी यह मंजर देख ले ना 
आज भर ठहर जाना 
जिंदगी 
तू कल चली जाना....!!

गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

इक गज़ल....और कुछ कुछ....


तू रहे अच्छा,इसलिए खुद को मिटा रहा हूँ मैं
इतना सबकुछ करके भी तेरा रहा कहाँ हूँ मैं !
तेरे आने की राह बुहारने को मैं आया था यहाँ
तुझे नहीं पसंद तो ये ले,यां से जा रहा हूँ मैं !
अपनी हस्ती को संवारने को क्या-क्या किया
इसकी खातिर ना जाने कहाँ से कहाँ रहा हूँ मैं !
कभी फुर्सत के पलों को भी ठीक से ना जीया
कभी इस काम में कभी उसमें मरता रहा हूँ मैं !
तेरे आने के इंतज़ार में ही मैं इत्ता जीता रहा
ऐ मौत ज़रा ठहर जा कि अभी नहा रहा हूँ मैं !
तेरे आने से मन इक चिड़िया सा चहक उठा है
तेरे भीतर से ही कहीं उड़कर बाहर आ रहा हूँ मैं !
उसके घर की हर एक बातें मुझको मालूम हैं अब
खुदा के घर से ही होकर गाफिल आ रहा हूँ मैं !!
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तेरी पलकों पे भी एक 
आंसू सिमट आया है 
धत्त गलती हो गयी....
आंसू नहीं ,मोती था....!!
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गैर को उसने दिया बोसा 
की मेरे दिल ने आह क्यूँ ??
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उमड़ा तो बहुत था तुझे देख-देख कर 
मगर कभी बरस नहीं पाया था मैं !
तुझे दूर-दूर से देखकर ही 
मेरे खुद के पास आया था मैं 
तुने मुझमें ऐसा क्या जगा दिया था 
कि सोते में भी देखा किया तुझको ही 
एक ना पूरा होने वाला ख्वाब 
सूनी आँखों में बस गया था मेरे 
और फिर भी रौनक थी तेरे कहीं होने की 
आज जब तू मेरे पास नहीं है तो भी आकर देख ना 
तेरी यादों से हरदम हरा-भरा हूँ मैं
मेरे आस पास ही कहीं बसा करता है तू....
अब तो हरदम तू मेरे ही पास है कहीं
तेरी रंगीनियों से भरपूर है मेरी जिंदगी,,,,
मैनें खुद को कभी पाया ही नहीं तुझसे दूर कहीं
मैं जानता हूँ मैं हूँ जहां,तू है जरूर वहीँ कहीं
इस हवा में तू है,तू है सब चीज़ों में है अब फना
तुझे किस तरह बताऊँ अ जाना
कि तुझे किस तरह चाहता हूँ मैं....
कि तुझे इस तरह चाहता हूँ मैं
तुझे इसी तरह चाहता हूँ मैं.....!!

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बहुत बार सोचा है यार तेरी सूरत मिटा देने को
मगर क्या करूँ खुद को मिटाने से डरता हूँ मैं !
रोज शाम तक बिखर-बिखर जाया करता हूँ मैं
रोज सुबह तेरी यादों के साथ फिर से संवरता हूँ मैं !!

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सिर्फ आँख से ही ओझल होता है सब कुछ.....
और अगले ही क्षण बैठ जाता है दिल में
वो सब कुछ सदा-सदा के लिए.....!!

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अभी कुछ मत कह मुझे,अभी कुछ सोच रहा हूँ मैं
तू दिखाई मत दे कि तेरे बारे में ही सोच रहा हूँ मैं !
बहुत कुछ पा-पाकर खुद को ही खो दिया है इसने
और क्या पाना बाकी है आदम को,सोच रहा हूँ मैं !
आसमान की बुलंदी पर जा बैठा है आदम,कहते हैं
जमीर की बुलंदी कहाँ है बची इसमें खोज रहा हूँ मैं !
तेरी खूबसूरती पर वारी-न्यारी हुई जाती हैं अँखियाँ
तू गर होता भीतर भी सुन्दर, यही सोच रहा हूँ मैं !
आज तो तेरे बारे में सोच-सोच कर जीया करता हूँ
तेरे ना रहने पर क्या सोचूंगा उफ़,ये सोच रहा हूँ मैं !

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बहुत कुछ दबा पड़ा है मेरे सीने के भीतर
मरने के बाद भी इसे उघाडना मत दोस्तों !
बहुत कुछ झेला है जिंदगी ने,बताना क्या
रिश्ते किसी से मगर बिगाडना ना दोस्तों !
हम सबकी जिंदगी एक फिल्म है दोस्तों
बहुत कुछ बैन है,जिसे उघाडना ना दोस्तों !
बहुत कुछ कहना चाहता हूँ तुमसे मगर
किस बात से करूँ शुरू बतलाना तो दोस्तों !
कोई गज़ल लिखने का मतलब नहीं है मेरा
जो कुछ समझ पाओ,मुझे समझाना दोस्तों !
कुछ हलकी-फुलकी बात लिख दिल हुआ हल्का
अगर तुम्हें ना लगे ठीक तो बतलाना दोस्तों !

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मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

बक गया हूँ जुनूं में क्या क्या !! [1]

भगवान को बहुत मानते हो ना ?
तो ऐसा कैसे कर सकते हो ? 
कि तुम्हारे बंधू भूखे मरें !
और तुम डकारें लो !!
भगवान से बहुत डरते हो ना 
तो लोगों को कैसे डराते फिरते हो ?
जबकि तुम्हीं कहते हो कि 
सबका फैसला ऊपर होगा !!
सबका मालिक  एक है 
यह भी तो तुम्हीं कहते हो ना 
तो खुद को मालिक क्यूँ कहलवाते हो ?
मैनें देखा है तुम्हें अक्सर 
बहुत से संतों की शरण में भी 
वहां तुम क्या करते हो 
जब कि तुम उनकी किसी 
बात पे अमल तक नहीं करते ?
ऐसी सब बातें तुम करते हो 
जिनपर तुम कायम ही नहीं रहते 
तो खुद को वही दिखाओ ना,जो तुम हो 
जो हो ही नहीं वो 
दिखने का दिखावा क्यूँ करते हो 
हमें पता है कि तुम राक्षस हो 
आदमी होने का दावा क्यूँ करते हो ??
[इस भाव को कोई अन्यथा ना लेवे ,
ये प्रश्न मेरे खुद से हैं !!]
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मान लो कि कोई आपकी वह तारीफ़ करता है 
जिसके हकदार सचमुच में आप नहीं हो 
तो फिर उसे ऐसा कहने से रोक लो ना....
सच बताऊँ ??
तब तुम सचमुच आदमी बन जाओगे !!
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कभी तो सुनाई भी नहीं देता 
इस तरह भीतर बस जाता है 
कभी इतना शोर करता है कि 
वो भीतर कहर बरपाता है 
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कितनी बेहयाई से ये सब कुछ करता है आदमी 
कहते हैं लोग कि खुदा से बहुत डरता है आदमी !
यह डर अगर ऐसा है कि आदमियत ही भूल जाए 
डर ना रहा तो क्या पता क्या बन जाएगा आदमी !! 
धरती को तो गटर बना डाला है इसने 
आसमान में क्या तलाश रहा है आदमी !
क्यूँ फ़िक्र करता है तू आदमी की 
अबे पहले खुद तो बन जा आदमी !!
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मुझ जैसे बहुत लोगों को यह चिंता है कि कहाँ जाएगा आदमी 
उन जैसे लोग यह कहते हैं कि मैं भी आखिरकार वहीँ जाउंगा...!!
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किसी सिम्त चैन नहीं आता गाफिल 
या तो यः फिक्र छीन ले या फिर हस्त !!
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खुद की असलियत  को पहचान  ले 
गाफिल खुद को आईना बना के देख ! 
मुझे सब्र है कि दुनिया बदल जायेगी 
मेरे बाद मुझे फिक्र ही कहाँ आ पाएगी !
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आदमी को आदमी बनाना चाहता है ?
अरे भई रहने दे जो जैसा है उसे जीने दे !!
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जिन्दादिली इसी को कहा करते हों शायद 
किसी के दिल को ज़िंदा ही हलाल कर देना !!
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मैं इसी वक्त अपने गम भूल जाऊं 
इक ज़रा हंस कर दिखा दे मेरे यार !!
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मैं तेरे नाम-का रसूख लेकर यां से जाऊं 
अ खुदा तू मुझे अपनी तरह का कर देना !! 
==================================================
एक-एक पल बेशकीमती है इस धरती पर 
आदमी किसी चीज़ की कीमत नहीं जानता !
क्या-क्या कीमत लगाए बैठा है किन-किन चीज़ों की 
यः आदमी खुद की तो कीमत तक नहीं पहचानता !! 
===================================================
अब चलता हूँ दोस्तों,सबको विदा 
मुझे तुम किसी दिन याद कर लेना !! 
====================================================
यूँ आंसू ना टपका,बहुत कीमती हैं 
इनके मुकाबिल मिरी जान सस्ती है !!
=====================================================
एक आदमी पगलाया हुआ शहर में फिर रहा है 
आपको दिखाई दे तो उसे गाफिल समझ लेना !!
======================================================
आज के बाद नहीं लिखूंगा,ऐसा बहुत बार सोचा है 
मगर क्या करूँ,रात जाती है और दिन निकलता है !! 

मंगलवार, 27 मार्च 2012

दिनांक २७-०३-२०१२ रात ग्यारह से बारह के बीच....

[१]
समय जो चलता जाता है 
किसी को समझ ना आता है 
वो अपनी ही करता जाता है 
आदमी को नहीं यह भाता है !!
समय से आगे चलने को 
भागते-फिरते रहने को 
ये कितना व्याकुल है आदमी !!
कभी इधर-कभी उधर 
कभी यहाँ-कभी वहाँ 
अजीब सी फितरत है आदमी !!
तरह-तरह के शौक हैं
और कई तरह के इनाम भी
तरह-तरह के चोंचले
कई तरह से बेईमान भी
अच्छाई की कामना करता हुआ
जो खुद में ही है बेईमान भी
जो दूसरों को लताड़ता
तरह-तरह से दहाड़ता...
ये किस तलाश में है आदमी !!
ये कौन से मुकाम की खातिर
हर वक्त ही लड़ रहा है आदमी !!
समय बड़ा बलवान है..
पर आदमी को नहीं पहचान है !!
तरह-तरह से भेद से
सबको-सबसे है बांटता...
भाई-भाई का रट्टा लगाता
और एक दुसरे को काटता....
खुद को बड़ा ही सभ्य समझता
पशुओं से गया-गुजरा रहा
ये कौन सी नस्ल का जीव है....
ये गया-बीता हुआ आदमी...
इस आदमी को बुहार दो...
ओ धरती माँ..
अब तुम्हीं से है ये प्रार्थना
इस आदमी को मार दो....
इस आदमी को मार दो....
इस आदमी को मार दो....!!!

[२]
बहुत उदास हूँ...
मैं खुद के आस-पास हूँ !
कभी जो ना हो पूरी
मैं इक ऐसी प्यास हूँ !
बहुत उदास हूँ...
बहुत सी बातें कहनी थीं
मगर मैं चुप-चुप ही रहा
सभी के साथ चलते-चलते भी
मैं खुद में ही सिमटा रहा
किसी से जाकर क्या कहूँ
किसी को पाकर क्या कहूँ
किसी से आकर क्या कहूँ
बहुत उदास हूँ...
समय अभी वो आया नहीं
कुछ मुख़्तसर सी बातें हैं
जिन्हें सबसे कहना है
जिन्हें सबको समझना है
और जिनपे सबको चलना है
कि कह ना पाए कोई कभी
कि बहुत उदास हूँ....!!

[३]
अजीब सी इक खलबली होती रहती है इस दिल में
इक चुभन सी होती-होती रहती है इस दिल में !
किसी-ना-किसी-सी बात पर गुमसुम हो जाता है कहीं
अभी यहीं था अब कहाँ चला जाता है ये कहीं
अच्छाईयों के लड़ता हुआ खुद ही बुरा बन जाता है ये
अच्छे की तलाश में अच्छा-अच्छा-सा कुछ करते हुए
ना जाने कितनों की नज़र में बेवजह ही चढ़ जाता है ये !
करना तो चाहता है बहुत ही कुछ
कर नहीं पाता है ये कभी भी कुछ
बस इसी तरह के माहौल में
उठा-पटक और मोल-तोल में
बसर हो रही है सभी की जिंदगी
तरह-तरह की बेईमानिया करता हुआ
करता है ये कैसी-कैसी बंदगी....
नूरे-खुदा को कुफ्र के गहरे अंधेरों में ठेल कर
करता है बात रौशनी की,
अजीब सा पागल है आदमी
हर वक्त ही काम करता है
दूसरों को सता कर मारने के
और खुद पे बन आ जाए जब....
करता है ना जाने कितने शिकवे-गिले
जब तक इसी तरह की फितरत बनी रहेगी
दिल में खलिश मेरे बनी ही रहेगी
आदमी अगर खुद को ज़रा भी बदल सकता नहीं
तो अपनी फितरत को मैं भी मिटा तो सकता नहीं
अजीब सी इक खलबली होती रहती है इस दिल में
इक चुभन सी होती-होती रहती है इस दिल में !

शनिवार, 25 फ़रवरी 2012

बस इक बार....ज़रा तू रास्ता तो बदल कर देख.....!!!


मन बहुत अशांत है ना
और वो तो अशांत ही रहेगा तेरा
तूने जो चुना है खुद के लिए रास्ता
वो हमेशा-हमेशा अशांति की ओर ही जाता है
तू चुने चाहे अपना कैरियर या कुछ भी और
तेरी चाहना का स्त्रोत महज तेरा स्वार्थ है या कोई और हवस
तेरे सपनों में तेरी जो दुनिया है
वो एक आरामतलब और ऐश्वर्यपूर्ण और कपटपूर्ण दुनिया है
तू चाहता है कि अपने मतलब के लिए तू सबसे कपट करे
मगर तूझे कोई धोखा ना दे तुझसे कोई मक्कारी ना करे
मगर मेरे दोस्त ऐसा कभी ना हुआ है और ना होगा ही कभी
जब भी कोई चुनता है मक्कारी भरी राह
तो यह तय हो जाता है कि उसका अंत क्या होगा
बेशक कुछ दिन वो राज करता हुआ दिखाई पड़ता है भी है
मगर ये टिमटिमाहट महज कुछ दिनों की ही होती है....
और एक महत्वपुर्ण बात और
कि राज करते हुए इस सारे समय में
वो कभी शांत नहीं होता और सही तौर पर सुखी भी नहीं
बेशक उसके धन-वैभव भरे जीवन से ऐसा प्रतीत हो
कि पता नहीं कौन सा ऐश्वर्यपूर्ण जीवन जी रहा होओ वह
मगर मेरे दोस्त एक बात बताऊँ मैं तुझे....??
खुशी की चाभी ऊपर वाले ने कभी धन-दौलत के हाथ में नहीं दी
और दूसरों का हक मारकर खाने वालों और
तरह-तरह की गद्दारी कर के जीने वाले अगर कभी भी
अपने मरने के बाद यह देख पायें कि उनके बच्चों पे क्या गुजरी
तब वो सोचने लगेंगे कि हाय मैनें यह क्या कर डाला
अपने और अपने परिवार के जिस स्वार्थ की खातिर
उन्होंने यह सब किया अपने पूरे जीवन भर
वो परिवार तहस-नहस होने की हालत में है अब..!!
अरे मैं तो अपनी सात पुश्तों का इंतजाम करके आया था...
और यहाँ तो एक पुश्त भी सुखी नहीं है....!!
मेरे दोस्त....हराम का वैभव थोड़े दिनों का वैभव भले ही दे दे
लंबी पारी में हरामखोरी बदनामी ही प्रदान करती है....!!
इसलिए ओ मेरे दोस्त.....
जिंदगी चूँकि कभी किसी को दुबारा नहीं मिलती
सोचने भर के लिए भी नहीं.....
इसलिए तूने अपने लिए जो रास्ता चुना है
जो सिर्फ तेरे और तेरे परिवार के पेट और वासना के वास्ते है
उस पर कभी इक पल भर के लिए विचार कर ना....!!
सच बताता हूँ...तेरे मन से एक बहुत बड़ा बोझ उतर जाएगा
तुझे सचमुच का रास्ता भी मिल जाएगा....
मन की शान्ति,जिससे तू वंचित है सदियों से सदा
तुझे वो भी सदा-सदा-सदा के लिए मिल जायेगी.....
बस इक बार....ज़रा तू रास्ता तो बदल कर देख.....!!!!