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सोमवार, 28 मई 2012

बहुत दिनों से चाहर रहा हूँ लिखना एक कविता

बहुत दिनों से चाहर रहा हूँ लिखना एक कविता
मगर पूरी ही नहीं हो पा रही है यह कविता....
यह कविता भूखे लोगों की है
बेबस और कमजोर लोगों की है
यह कविता मेहनतकश लोगों की है
यह कविता स्त्रियों और बच्चों की है
यह कविता तमाम असहायों की है
यह कविता पीड़ित मानवता की है
यह कविता लोगों की जीवंत अभीप्सा की है
कविता तो यह उपरोक्त लोगों की ही है
मगर अनचाहे ही यह कविता
कुछ दरिंदों की है,कुछ राक्षसों की भी
कुछ हरामियों की की है,कुछ कमीनों की भी
इंसानियत के दुश्मन कुछ समाजों की भी
धर्म के आडम्बर से भरे कुछ लोगों की भी
स्त्रियों और बच्चों का शोषण करने वालों की भी
और मानवता को शर्मसार करने वालों की भी
यह कविता कुछ अत्याचारियों की भी है और
कुछ अनंत धन-पशुओं और देह-भोगियों की भी है
मगर दोस्तों यह कविता मेरी-आपकी किसी भी नहीं है
क्योंकि हम तो यह कविता पढने-लिखने
फेसबुक पर लाईक और कमेन्ट करने वाले शरीफ लोग हैं
और कवितायें शरीफों की नहीं होती
इसलिए आईये ओ दोस्तों
हम कुछ बेहतर अगर नहीं कर सकते
खुद भी अगर बदल नहीं सकते
आज से हम भी हरामी और कमीने बन जाएँ
और कोई हम पर भी कुछ कविता लिख ही डाले....!!
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कहीं भी कुछ भी हो जाए यह हमारी जिम्मेवारी नहीं है
और हम अगर कुछ कर भी ना पायें तो लाचारी नहीं है
कोई तड़पता हुआ हमारी आँख से सामने मर भी जाए,तो क्या हुआ
किसी स्त्री की इज्जत सरेआम लुट भी जाए तो क्या हुआ
अभी-अभी कोई गोली ही मार दे किसी को तो हम क्या करें
अभी कोई किसी को उठा कर ले जाए तो हम क्या करें
हम क्या करें अगर संसद में शोर-शराबा हो रहा होओ
हम क्या करें जब सब कुछ हमारा लुट-पिट रहा होओ
अभी-अभी हम भ्रष्टाचार पर चीखेंगे-चिल्लायेंगे
अभी-अभी हम किसी गीत पर झूमेंगे गायेंगे
अभी-अभी हम किसी एक चोर को गद्दी से हटायेंगे
अभी-अभी हम किसी दुसरे चोर की सरकार बनवायेंगे
बहुत कुछ घटने वाला है अभी हमारी आँखों के सामने
पूरा देश ही लुट जाने वाला है हमारी आँखों के सामने
अपने अहंकार के बात-बात पर हर किसी से लड़ने वाले हम
कभी एक क्षण भर के लिए भी यह नहीं सोच पाते कि
अपना यह लुटा-पिटा अहंकार और यह झूठी गैरत लिए
खुदा के घर वापस जाकर भी उसे क्या मुहं दिखायेंगे !!
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कहनी होती हैं बहुत सारी बातें
कहते-कहते रूप बदल जाता है !
खडा होता हूँ आईने के सामने
इकबारगी अक्श बदल जाता है !
कहना चाहूँ हूँ तुझसे कुछ,मगर
तेरे आगे लफ्ज़ फिसल जाता है !
हर बार तिरी तारीफ़ करता हूँ
हर बार कुछ और बदल जाता है !
रुकना तो बहुत चाहता है आदम
यहाँ से पर चला ही हर जाता है !
हर बार तेरे पा पकड़ता हूँ यारब
और हर बार तू मुकर जाता है !
तू भी इक किस्सा बन जायेगा "गाफिल"
बहुत तू यहाँ अपनी हेंकड़ी दिखाता है !
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मुझसे बचकर रहना ओ तू प्यारे
मुझमें तो इक आग बसा करती है !
हल पल जो मुझमें बहती रहती है
अपनी कसौटी मुझे कसा करती है !
मैंने जब-जब तुझको देखा यारब
कोई लपट मुझमें निकला करती है !
मैं मांगू तो क्या मांगू तुझसे यारब
तेरी कमी धरती पर बहुत खलती है !
ऊपर जाकर भी तुझको देखूंगी मैं
मेरी मां मुझसे अक्सर कहा करती है !
मुझको लिखना कुछ अच्छा नहीं आता
दुनिया अच्छी है,इसको अच्छा कहती है !
===========================तेरा मेरा तू क्या करता है
तेरा सब धरा रह जाएगा !
उलटा-सीधा करता रहता है
उससे आँख मिला पायेगा ?
थोड़ा दूसरों को भी बांटा कर
ज्यादा खाया तो मर जाएगा !
जिन्दगी उसकी दी नेमत है
बेहतर जी ले,कब मर जाएगा !
तुझमें दम बहुत है प्यारे,पर
उससे डर गो,कुछ हो जाएगा !
कितना लालची बन्दा है तू
सबका हिस्सा ही खा जावेगा !
बस इक छोटा-सा परिवार तेरा
बस कर अब कितना खावेगा !
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इन दिनों खुश बहुत रहता हूँ
इन दिनों मुझको गम बहुत हैं !
खुद से खुद को झेलने के लिए
इक खुद अकेले हम बहुत हैं !
खुद से हम क्या-क्या चाहते हैं
खुद से हमको जंग बहुत है !
आज करे क्यूँ,कल कर लेना
कुछ करने को जनम बहुत हैं !
क्या-क्या करना है आदम को
ये सोचने को आदम बहुत हैं !
धरती को हम खूब सोखेंगे
धरती में अभी दम बहुत है !!
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सबके बीच भी तनहा हूँ,अजीब हूँ मैं
क्या-क्या बकता रहता हूँ अजीब हूँ मैं !!
कितने सवालों के घेरे में है ये आदम
उलटा उससे प्रश्न करता हूँ,अजीब हूँ मैं !!
सब लागों के सारे गम को खुद में भरकर
खुद ले लिपट कर रोता हूँ अजीब हूँ मैं !!
तुझे अक्सर देखा करता हूँ कुछ इस तरह
तुझको खुद में पाया करता हूँ अजीब हूँ मैं !!
खुद के साथ भी बहुत देर तक रह नहीं पाता
खुद को तनहा छोड़ जाता हूँ अजीब हूँ मैं !!
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आगे बढ़ते जाने की एक अंतहीन हवस
ज्यादा और ज्यादा पाने की एक बेकाबू प्यास
सब कुछ को पाने के लिए किये जाते उलटे-सीधे
हमें खुद को तो जला-पिघला रहे हैं ही हैं
मगर हमसे ज्यादा जल रही है यह धरती
जो जाने कब मिट कर ख़त्म हो जायेगी
यह हम धरती को प्यार करने वालों को भी नहीं पता,,,,!!
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जीवन का अर्थ यूँ तो आनंद है,किन्तु खुद के चारों ओर दुःख-ही-दुःख व्याप्त हो,
 तो उसे अपनी शक्ति भर दूर करना भी एक कर्त्तव्य है...
और यह कर्त्तव्य ही दरअसल एक आनंद ही है.....!!
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रविवार, 13 मई 2012

क्या अब भी कहूँ मैं हैप्पी मदर्स डे !!


हर पल इक नया दर्द है,जिन्दगी
आ मुझे बांह में भर ले जिन्दगी !
मुश्किलें सख्त हैं तेरे हर रस्ते में
मुश्किलों का हल भी है जिन्दगी !
अच्छे रस्तों में कोई साथ देता नहीं
फिर भी अच्छी लगती है जिन्दगी !
तेरे संग मिलकर चलना चाहता हूँ
आ मेरे संग ही तू चल जिन्दगी !
हर किसी को ख़ुशी दें सकें अगर
काम आ जाए सच में ही जिन्दगी !
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हम किसी को आखिर क्या देते हैं
खुद का चरित्र बयान कर देते हैं !
धरती है,प्राणी हैं और इंसान भी
सबको अपनी बपौती समझ लेते हैं !
खोद-खोद कर धरती का हर कोना
इस माता को कंगली किये देते हैं !
सिर्फ अपने बारे में सोचा करते हैं
और बातें अच्छी,बड़ी-बड़ी करते हैं !
सबसे मिलकर रहना अभी सिखा नहीं
फिर भी हम खुद को समाज कहते हैं !
सोचता हूँ कि कह दूं मुहं पे खरी-खरी
कुछ सोच कर मगर मूंह सी लेते हैं !!
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किसी लड़की को गन्दी नज़र से देखना
और फिर कहना हैप्पी मदर्स डे
है तो बड़ा अपमानजनक मगर
मैं क्या जानूं कि किसी के मन में क्या है ?
अभी भी कोई बिटिया मारी जा रही है गर्भ में
और बातें भी की जा रही हैं टी.वी.पर बड़ी-बड़ी
सचमुच क्या बदल रहा है इस सबसे ?
क्या सचमुच कुछ बदल ही जाना है इसके बाद ?
मैं देख रहा हूँ बहुर सारी बच्चियों की
आँखों से निकलती हुई चिंगारियां
जो किसी ना किसी अपने-सगे की
हवस का शिकार हुई हैं कभी-ना-कभी !
कैसा लगता होगा उन्हें जब कोई वहशी इंसान
उनके सामने ही कहे हैप्पी मदर्स डे !
जो बनाने को आतुर है उन्हें बिन ब्याही हुई माँ !
अपनी चारों तरफ देख रहा हूँ दरिंदों का विशाल साम्राज्य
और स्टेज पर महिलाओं का स्वागत-गान करते हुए
सब कुछ वैसा-का-वैसा ही चलता जा रहा है
मौक़ा मिलते ही पुरुष स्त्री का शिकार करता जा रहा है
फिर भी युग बदलने की अवधारणा मीडिया पर चा रही है
और इसी मीडिया मी किसी की माँ की-बहन की,की जा रही है !!
अभी-अभी बिटिया ने पूछा मुझसे एक प्रश्न
क्या आप करते हो अपनी माँ से बहुत-बहुत प्यार
मैंने कहा हाँ,तो उसने कहा तो फिर क्यों नहीं कहाँ आपने
अपनी मम्मी को हैप्पी मदर्स डे ??
मैं निरुत्तर हूँ तब से मगर यह विचार आ रहें हैं
कि हम सब भला कहाँ जा रहे हैं ?
दोस्तों,सच में माँ में जो असीम ममता है,सच्चाई है
और धरा पर यह नेमत भला किसने नहीं पायी है !
दुनिया की ओ तमाम स्त्रियों
तुम्हें इस नाचीज़ का अपने पूरे भरे-भीगे अंतर्मन से
हैप्पी-हैप्पी-हैप्पी मदर्स डे तो ऑल ऑफ यूं....!! 
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दर्द तो बिखरा हुआ है मेरे सीने में
सलवटें पड़ी हुईं हैं क्यूँ फिर माँ के माथे पर !!

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बातें-बातें-बातें कित्ती प्यारी बातें
हम सब जिन्हें करते नहीं अघाते
दुनिया को अपने ठेंगे पर रखते
अच्छी दुनिया की बातें बनाते
तरह-तरह के मंचों पर सबको अपना बताते
इक ज़रा से गुस्से पर सबको हम लतियाते
बातें-बातें-बातें कित्ती प्यारी बातें
हम सब जिन्हें करते नहीं अघाते
जिन चीज़ों से दुनिया अच्छी होती
उनसे सदा मुहं ही बिसराते
सच के मुहं पर लगा कर ताला
हर क्षण झूठ बतियाते
बातें-बातें-बातें कित्ती प्यारी बातें
हम सब जिन्हें करते नहीं अघाते
घमंड को अपनी शान समझते
और गरीबों से पीछा छुडाते
जिस सीढ़ी पर चढ़कर आये
उसे ही काट गिराते
निर्ममता को अपनी कूंजी बनाकर
हवस से धन कमाते
और किसी की हाय की फिक्र नहीं हमें
उस धन को निर्लज्जता से उड़ाते
 
बातें-बातें-बातें कित्ती प्यारी बातें
हम सब जिन्हें करते नहीं अघाते !!

मंगलवार, 8 मई 2012

पागल हूँ....दीवाना हूँ.....या कि क्या हूँ मैं....!!??

सुबह होने दो,सुबह को हम ये पूछेंगे 
रात भर तेरे साथ क्या क्या हुआ 
तुझको बिछडा हुआ सूरज मिला कि नहीं....
रात होते ही तू बौरा-सा क्यूँ जाता है...
दिन निकलते ही सब कुछ वही सा हो जाता है 
फिर भी जाने क्यूँ ऐसा-सा लगता है....
रात ने अपनी कोख से इक नया दिन है जना....!!
रोज इक नयी सी रात हुआ करती है....
ठीक उसी तरह,जिस तरह 
इक नया दिन निकलता है....!!
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तू तो जाकर के कहीं 
और भी मुझमें गया है समा 
तेरे लफ़्ज़ों को पीता हूँ....जीता हूँ....
तेरी आवाज़ रूह बनकर मेरी 
मेरे भीतर ही कहीं हो गयी है फना....!!
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जिसको गाता रहा हूँ मैं उम्र भर....
जिसने मुझको बड़ा किया है इतना 
मैं किसी को ये बता भी नहीं सकता 
मेरे जीतू ने मुझे दिया है कितना-कितना....!!
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एक गुजरा हुआ कल,जो कभी ना लौटेगा...
अपने लफ़्ज़ों से तर हमें करता रहेगा....
लफ्ज़ के मानी यही तो होते हैं...
चेहरे रहते नहीं मगर लफ्ज़ रह जाते हैं 
और ये ही लफ्ज़ अक्सर हमारे जेहन में 
चेहरा बन-बन कर आते हैं....हमें रुलाते हैं....!
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ख़्वाबों की फसल काटने को जा रहें हैं 
अ चाँद-तारों ज़रा ठहरो,हम आ रहे हैं....!!
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उसका चेहरा अगर हंसा-हंसा सा लगे 
तो यह भी तय है कि मौसम भी खिला-खिला सा लगे....!!
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मेरी बातों से मुझे सख्त एतराज़ होने लगा है 
ऐसा लगता है कि ये बातें कही ही नहीं मैनें !
खुद का लिखा हुआ या कहा हुआ होना होना 
खुद के होने की सबसे बड़ी निशानी है 
आदमी फिर क्यूँ ये दोगला हुआ जाता है 
उसके होने में अगर उसका होना सच नहीं है तो फिर 
उसको आखिर किसकी खाल का मान लिया जाए !!
और फिर खुद की बातों को झुठला देवे अगर कोई 
या तो पैदा ही हुआ नहीं वो या मर गया है वो....
किसी ने कुछ कहा है तो इसका मतलब जन्मा है वो कभी 
मगर खुद के चेहरे से मुकर रहा है गर अपनी बातों के बाईस 
तो फिर यह तय कि मरनेवाला है वो....या मर गया है वो अभी....!!!
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सोच-समझ कर चल कि ये पल बदल रहा है 
ना जाने किस तरफ से कैसी हवा चली आये !
जिंदगी को तेज रफ़्तार में बदल दिया है मैंने 
ना जाने कौन सा पल मेरी मौत की खबर लाये !!
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जब भी खुद भीतर मैं नहीं होता.....
कोई आ जाया करता है मेरे भीतर 
सांस रुककर एक टक देखने लगती है उसे
जैसे देखा ही नहीं कभी उसने मुझे...
जब नहीं होता मैं खुद के भीतर कभी 
कोई खो जाता है आकर अंदर मेरे 
दूर तक जाकर जब मैं वापस लौटता हूँ 
किसी और को पाकर अपने भीतर बेचैन हो जाता हूँ 
मेरी साँसे तक उसी के लिए मचलती हैं...!
डरने लगता हूँ कि बिखर कर मर ना जाऊं कहीं 
कोई रूह बनकर समाया हुआ-सा मुझमें रहता है
मेरे तन को मुझसे अलग नहीं होने देता कभी
और इसी तन को खुद का चेहरा समझ लिया है मैंने
कोई आकर कहता है मुझसे,कि ये तू नहीं है
खुद को ढूँढता हुआ जाने कहाँ आ पहुंचा हूँ
मेरा खुद भी मुझसे लापता हो चुका है अब
खुद को ढूँढता हुआ मौत के करीब जा रहा हूँ मैं
फिर कहता हूँ कि अ जिंदगी आ रहा हूँ मैं....!!

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आ कि मिलकर कुछ ख़्वाबों को बना लें हम
फिर उसके बाद जिंदगी में ये रंग रहें ना रहें.....!!

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किसी ने पसंद किया है मुझे इतना कि
मैं खुद को अच्छा लगने लगा हूँ
आज मालूम हुआ है ये कि
मुझमें मैं ही बसा हूँ.....!!!

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आज की रात अगर नींद ना आई तो क्या करूँगा मैं
रात भर तुझसे से नींद के बारे में बातें करूँगा मैं...!!

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भीतर तक तन्हां हूँ मैं
ए कजा आ
मेरे भीतर तक समा जा
शर्त ये है कि मुझमें आकर
तू किसी और में ना जा....!!

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गम को बहुत ज्यादा छिपाएँ तो
और ज्यादा दिखाई देता है...
और अगर उससे मजा पायें तो
वो आधा दिखाई देता है....!!

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ये कौन हंस रहा है मुझपर
मुझे अच्छा लग रहा है...
किसी ना किसी बहाने सही
वो खिलखिला तो रहा है !!

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सँभलने की कोशिश में अक्सर
हम बिखर जाया करते हैं...
इक छोटे से दिल में इत्ते खाब
क्यूँ आया-जाया करते हैं !!

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जो हो रहा है,जो भी हुआ है....
ठाकुर जी की मर्जी....
वैसे भी हमने लगाई नहीं
उसे कोई भी अर्जी....!!

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मिजाज थोड़ा वैसा-सा है
क्या करूँ मैं....
खुदा को बचा नहीं सकता
तो खुद मरुँ मैं....
तेरी इनायतें मुझपे करम हैं
मरने के बाद भी तुझे
ना भूला सकूँ मैं...!!

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दर्द बढ़ता ही जा रहा है
मुस्कुरा रहा हूँ मैं....

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तेरे रू-ब-रू जो हुआ हूँ,मैं खुद को को भूल गया....
मैं ये भी जानता नहीं कि मैं क्या-क्या भूल गया !!

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सांस के अगले सिरे पर मौत खड़ी है
जिंदगी फिर भी मुस्कुराती ही रही है !
सूरज तक रूठा हुआ है मुझसे आज
आज आसमां में कोई लड़ाई छिड़ी है !!

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बुझती हुई आग हूँ तो फिर क्यूँ जल रहा हूँ
दुनिया के तमाम मसलों पे क्यूँ उबल रहा हूँ !!
सर के ऊपर आसमां पे क्यूँ सूरज तप रहा है
नीचे जमीं पर तनहा मैं यूँ ही पिघल रहा हूँ !!

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गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

आज भी जो कुछ लिखा......

भीतर-ही-भीतर कोई पिघलता जा रहा है 
मेरे भीतर से जैसे कोई बाहर आ रहा है !!
किसी के समझ नहीं आने को है यह बात 
मुझे भी कोई बहुत देर से ये समझा रहा है !!
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दर्द को बहुत भीतर तक छिपाता हूँ मैं 
उफ़,मगर दर्द बाहर आ ही जाता है!!
कोई धोखा दे डालता जब किसी को 
कलेजा कट कर बाहर आ ही जाता है !!
आदमी अगर सचमच आदमी सा रहे 
चिलमन को खुद ही मजा आ जाता है !!
आदमी किसी को सजा क्यूँ देना चाहता है 
आदमी तो खुद ही बहुत सज़ा पा जाता है !!
मैंने बहुत हुस्न देखा है मगर सच कहूँ ?
सिर्फ अच्छापना ही आदमी को भाता है !!
कोई तूझे भीतर तक देख ना ले "गाफिल"
तू हर वक्त अपना आपा क्यूँ खो जाता है ?
==========================
भीतर-ही-भीतर कोई पिघलता जा रहा है 
मेरे भीतर से जैसे कोई बाहर आ रहा है !!
किसी के समझ नहीं आने को है यह बात 
मुझे भी कोई बहुत देर से ये समझा रहा है !!
जल जाने के बाद क्या मिलता है परवानों को 
तेरे जाने के बाद यह मुझे समझ आ रहा है !!
अभी तो वह खुद नफ़रत की फसल बो रहा है 
उसके बच्चे भुगतेंगे,उसे समझ नहीं आ रहा है !!
मैनें अक्सर उसे मेरे भीतर ही आते हुए देखा है
मगर आज वो जाने क्यूँ मुझसे बाहर जा रहा है !!
कुछ समझाना चाह रहा हूँ लोगों को मैं बरसों से
किन लफ़्ज़ों में समझाऊं,समझ नहीं आ रहा है !!
मैं मेरे बाहर ग़मों से भरा जा रहा हूँ "गाफिल"
और वो मेरे भीतर बैठा मुझपे मुस्कुरा रहा है !!

==========================
शब भर जागेगा चाँद और
तारे भी शब भर जागेंगे
रात भी जागेगी सारी रात
इतने लोगों के बीच भला....
मैं कहाँ तन्हा हो पाउँगा...!!

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मुझे पता था कि तू मुझे पसंद नहीं करता
इसीलिए नज़र फिराता रहता मुझसे तू
मगर आज जब यहाँ नहीं हूँ तो ये क्या
तेरे लब कपकपाने लगे आँख में आंसू आ गए...!!

===========================
छोड़ ना,अब मत ना गिला कर तू किसी बात का 
तेरी खुशियों के लिए तुझे छोड़ कर जा रहा हूँ मैं !!
=============================

आग लगी हुई है भीतर मेरे ऐसी 
कहीं मैं ख़ाक तो नहीं हो जाउंगा 
जिदगी में ही जब कुछ नहीं पाया 
मरकर भी भला क्या पा जाउंगा...!!

रविवार, 22 अप्रैल 2012

आज जो कुछ कह गया.....

हर सू जो दिखाई देता है,वो कौन है 
इस बात पर मेरे भीतर भी मौन है !!

======================
कोई किसी को क्यूँ पसंद करता है
मैं ये नहीं जानता 
जिंदगी तूने मुझे पसंद किया तो....
मुझमें जरूर कोई बात रही होगी....!!!!

=======================
मुझे पता है कि एक दिन 
तू मुझे अपनी सेज में लिटा कर 
अपनी बाँहों में भरकर प्यार करेगी 
बस इसी प्यार की खातिर 
यह इत्ती बड़ी जिंदगी जिए जा रहा हूँ 
अ मौत,तू थोड़े दिन और ठहर 
मैं थोड़े दिनों में ही आ रहा हूँ....!!!!

==========================
उम्र की सलीब पर कुछ साँसे टंगी हुईं हैं...
वो अगर चुक जाएँ,तो चलूँ 
मौत अगर हाथ आ गयी 
दौलत हाथ लग जायेगी 
जिंदगी को पकडूं तो हाथ मलूँ

============================
एक और आदमी है मुझमें 
जो हरदम पगलाया हुआ है 
मैं आपको शांत लग सकता हूँ 
वो तावक्त बौराया हुआ है 
मैं उससे सच में मिलना नहीं चाहता 
मगर रहता है वो मुझमें ही कहीं 
मुझे बाहर निकलते वक्त...
मुझमें वापस घुसते वक्त 
पल-पल सामना होता है मेरे-उसका 
मैं क्या करूँ उस पागल का 
आप ही बताऊँ ना दोस्तों....
मैं क्या करूँ उस पागल का....!!

===============================
रात भर खोजता रहता हूँ.....सुबह को....
रात भर मुझे नींद नहीं आती...
सुबह सोने से ठीक पहले 
कुछ खाब आते है रात के 
और मैं जान जाता हूँ...
कि रात भर खूब सोया था मैं 
खाब ना आये तो पता भी न चले 
कि कब रात गयी....
कब सुबह हुई....
ये ही कुछ खाब हैं 
जो मुझे जगाये हुए हैं....
जो मुझे जिलाए हुए हैं....!!!

=================================
चाँद बनकर कुछ सोचा था मैंने....
चांदनी हिस्से में आ गयी....
इससे पहले कि उसे बाहों में भर लेता मैं....
रात मेरे आड़े आ गयी.....
==================================
किसी को कोई बताए ना.......
इसी चाँद को चूमता रहा हूँ मैं सौ-सौ बार....
हज़ार-हज़ार बार.....
आज पता चला यह कि 
यह रौशनी किसी शाम की देह की चिंगारियां थी
....जभी मैं सोचूं.....
चाँद में ये भीगी-भीगी से तपिश सी कैसी है.....!!
======================================

कल चली जाना 
आज भर ठहर जा ना....
जिंदगी 
मुझे पहले मौत को 
अपनी बाहों में भर कर 
चूम लेने दे 
पुरजोश प्यार कर लेने ना 
तू भी यह मंजर देख ले ना 
आज भर ठहर जाना 
जिंदगी 
तू कल चली जाना....!!

गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

इक गज़ल....और कुछ कुछ....


तू रहे अच्छा,इसलिए खुद को मिटा रहा हूँ मैं
इतना सबकुछ करके भी तेरा रहा कहाँ हूँ मैं !
तेरे आने की राह बुहारने को मैं आया था यहाँ
तुझे नहीं पसंद तो ये ले,यां से जा रहा हूँ मैं !
अपनी हस्ती को संवारने को क्या-क्या किया
इसकी खातिर ना जाने कहाँ से कहाँ रहा हूँ मैं !
कभी फुर्सत के पलों को भी ठीक से ना जीया
कभी इस काम में कभी उसमें मरता रहा हूँ मैं !
तेरे आने के इंतज़ार में ही मैं इत्ता जीता रहा
ऐ मौत ज़रा ठहर जा कि अभी नहा रहा हूँ मैं !
तेरे आने से मन इक चिड़िया सा चहक उठा है
तेरे भीतर से ही कहीं उड़कर बाहर आ रहा हूँ मैं !
उसके घर की हर एक बातें मुझको मालूम हैं अब
खुदा के घर से ही होकर गाफिल आ रहा हूँ मैं !!
====================================
तेरी पलकों पे भी एक 
आंसू सिमट आया है 
धत्त गलती हो गयी....
आंसू नहीं ,मोती था....!!
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गैर को उसने दिया बोसा 
की मेरे दिल ने आह क्यूँ ??
=====================================
उमड़ा तो बहुत था तुझे देख-देख कर 
मगर कभी बरस नहीं पाया था मैं !
तुझे दूर-दूर से देखकर ही 
मेरे खुद के पास आया था मैं 
तुने मुझमें ऐसा क्या जगा दिया था 
कि सोते में भी देखा किया तुझको ही 
एक ना पूरा होने वाला ख्वाब 
सूनी आँखों में बस गया था मेरे 
और फिर भी रौनक थी तेरे कहीं होने की 
आज जब तू मेरे पास नहीं है तो भी आकर देख ना 
तेरी यादों से हरदम हरा-भरा हूँ मैं
मेरे आस पास ही कहीं बसा करता है तू....
अब तो हरदम तू मेरे ही पास है कहीं
तेरी रंगीनियों से भरपूर है मेरी जिंदगी,,,,
मैनें खुद को कभी पाया ही नहीं तुझसे दूर कहीं
मैं जानता हूँ मैं हूँ जहां,तू है जरूर वहीँ कहीं
इस हवा में तू है,तू है सब चीज़ों में है अब फना
तुझे किस तरह बताऊँ अ जाना
कि तुझे किस तरह चाहता हूँ मैं....
कि तुझे इस तरह चाहता हूँ मैं
तुझे इसी तरह चाहता हूँ मैं.....!!

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बहुत बार सोचा है यार तेरी सूरत मिटा देने को
मगर क्या करूँ खुद को मिटाने से डरता हूँ मैं !
रोज शाम तक बिखर-बिखर जाया करता हूँ मैं
रोज सुबह तेरी यादों के साथ फिर से संवरता हूँ मैं !!

===========================================
सिर्फ आँख से ही ओझल होता है सब कुछ.....
और अगले ही क्षण बैठ जाता है दिल में
वो सब कुछ सदा-सदा के लिए.....!!

============================================
अभी कुछ मत कह मुझे,अभी कुछ सोच रहा हूँ मैं
तू दिखाई मत दे कि तेरे बारे में ही सोच रहा हूँ मैं !
बहुत कुछ पा-पाकर खुद को ही खो दिया है इसने
और क्या पाना बाकी है आदम को,सोच रहा हूँ मैं !
आसमान की बुलंदी पर जा बैठा है आदम,कहते हैं
जमीर की बुलंदी कहाँ है बची इसमें खोज रहा हूँ मैं !
तेरी खूबसूरती पर वारी-न्यारी हुई जाती हैं अँखियाँ
तू गर होता भीतर भी सुन्दर, यही सोच रहा हूँ मैं !
आज तो तेरे बारे में सोच-सोच कर जीया करता हूँ
तेरे ना रहने पर क्या सोचूंगा उफ़,ये सोच रहा हूँ मैं !

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बहुत कुछ दबा पड़ा है मेरे सीने के भीतर
मरने के बाद भी इसे उघाडना मत दोस्तों !
बहुत कुछ झेला है जिंदगी ने,बताना क्या
रिश्ते किसी से मगर बिगाडना ना दोस्तों !
हम सबकी जिंदगी एक फिल्म है दोस्तों
बहुत कुछ बैन है,जिसे उघाडना ना दोस्तों !
बहुत कुछ कहना चाहता हूँ तुमसे मगर
किस बात से करूँ शुरू बतलाना तो दोस्तों !
कोई गज़ल लिखने का मतलब नहीं है मेरा
जो कुछ समझ पाओ,मुझे समझाना दोस्तों !
कुछ हलकी-फुलकी बात लिख दिल हुआ हल्का
अगर तुम्हें ना लगे ठीक तो बतलाना दोस्तों !

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मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

बक गया हूँ जुनूं में क्या क्या !! [1]

भगवान को बहुत मानते हो ना ?
तो ऐसा कैसे कर सकते हो ? 
कि तुम्हारे बंधू भूखे मरें !
और तुम डकारें लो !!
भगवान से बहुत डरते हो ना 
तो लोगों को कैसे डराते फिरते हो ?
जबकि तुम्हीं कहते हो कि 
सबका फैसला ऊपर होगा !!
सबका मालिक  एक है 
यह भी तो तुम्हीं कहते हो ना 
तो खुद को मालिक क्यूँ कहलवाते हो ?
मैनें देखा है तुम्हें अक्सर 
बहुत से संतों की शरण में भी 
वहां तुम क्या करते हो 
जब कि तुम उनकी किसी 
बात पे अमल तक नहीं करते ?
ऐसी सब बातें तुम करते हो 
जिनपर तुम कायम ही नहीं रहते 
तो खुद को वही दिखाओ ना,जो तुम हो 
जो हो ही नहीं वो 
दिखने का दिखावा क्यूँ करते हो 
हमें पता है कि तुम राक्षस हो 
आदमी होने का दावा क्यूँ करते हो ??
[इस भाव को कोई अन्यथा ना लेवे ,
ये प्रश्न मेरे खुद से हैं !!]
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मान लो कि कोई आपकी वह तारीफ़ करता है 
जिसके हकदार सचमुच में आप नहीं हो 
तो फिर उसे ऐसा कहने से रोक लो ना....
सच बताऊँ ??
तब तुम सचमुच आदमी बन जाओगे !!
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कभी तो सुनाई भी नहीं देता 
इस तरह भीतर बस जाता है 
कभी इतना शोर करता है कि 
वो भीतर कहर बरपाता है 
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कितनी बेहयाई से ये सब कुछ करता है आदमी 
कहते हैं लोग कि खुदा से बहुत डरता है आदमी !
यह डर अगर ऐसा है कि आदमियत ही भूल जाए 
डर ना रहा तो क्या पता क्या बन जाएगा आदमी !! 
धरती को तो गटर बना डाला है इसने 
आसमान में क्या तलाश रहा है आदमी !
क्यूँ फ़िक्र करता है तू आदमी की 
अबे पहले खुद तो बन जा आदमी !!
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मुझ जैसे बहुत लोगों को यह चिंता है कि कहाँ जाएगा आदमी 
उन जैसे लोग यह कहते हैं कि मैं भी आखिरकार वहीँ जाउंगा...!!
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किसी सिम्त चैन नहीं आता गाफिल 
या तो यः फिक्र छीन ले या फिर हस्त !!
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खुद की असलियत  को पहचान  ले 
गाफिल खुद को आईना बना के देख ! 
मुझे सब्र है कि दुनिया बदल जायेगी 
मेरे बाद मुझे फिक्र ही कहाँ आ पाएगी !
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आदमी को आदमी बनाना चाहता है ?
अरे भई रहने दे जो जैसा है उसे जीने दे !!
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जिन्दादिली इसी को कहा करते हों शायद 
किसी के दिल को ज़िंदा ही हलाल कर देना !!
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मैं इसी वक्त अपने गम भूल जाऊं 
इक ज़रा हंस कर दिखा दे मेरे यार !!
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मैं तेरे नाम-का रसूख लेकर यां से जाऊं 
अ खुदा तू मुझे अपनी तरह का कर देना !! 
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एक-एक पल बेशकीमती है इस धरती पर 
आदमी किसी चीज़ की कीमत नहीं जानता !
क्या-क्या कीमत लगाए बैठा है किन-किन चीज़ों की 
यः आदमी खुद की तो कीमत तक नहीं पहचानता !! 
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अब चलता हूँ दोस्तों,सबको विदा 
मुझे तुम किसी दिन याद कर लेना !! 
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यूँ आंसू ना टपका,बहुत कीमती हैं 
इनके मुकाबिल मिरी जान सस्ती है !!
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एक आदमी पगलाया हुआ शहर में फिर रहा है 
आपको दिखाई दे तो उसे गाफिल समझ लेना !!
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आज के बाद नहीं लिखूंगा,ऐसा बहुत बार सोचा है 
मगर क्या करूँ,रात जाती है और दिन निकलता है !!